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हटा दो

तो फिर हटा दो वो झूठे लाज का घूंघट
वो तौर तरीकों के जाले
वो नज़ाखत वो अदाएं …
फिर ही तो मिल पाओगे मुझसे तुम
बेबाक , बेशरम, बिना झूठ बिना सच
बिना खुद के , बिना मेरे ।

फिर हटा देना वो सोच के दायरे
मैं क्या देखूंगा
क्या सोचूंगा
क्या कहूँगा
जब आना मुझसे मिलने
तो बस अपनी रूह लाना…
नंगी, अनछुई,
ना साफ़ ना मैली।

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4 Comments

  1. Hitesh Suhalka says

    कवयित्री का मानवीय रिश्तो को एक अलग दृष्टिकोण से परिभाषित करना सराहनीय है

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